सोमवार, 29 सितंबर 2014

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं।
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं।
जल गया सारा बदन इन मौसमों की आग में
एक मौसम रूह का है जिसपे अब ज़िंदा हूँ मैं।
मेरे होंठों का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तूने मुझको बाग़ जाना देख ले सहरा हूँ मैं।
देखिए मेरी पज़ीराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त की दहलीज़ पे आया हूँ मैं।

सोमवार, 4 अगस्त 2014

आसमान पर छाए बादल
बारिश लेकर आए बादल
गड़-गड़, गड़-गड़ की धुन में 
ढोल-नगाड़े बजाए बादल
बिजली चमके चम-चम, चम-चम
छम-छम नाच दिखाए बादल
चले हवाएँ सन-सन, सन-सन
मधुर गीत सुनाए बादल
बूँदें टपके टप-टप, टप-टप
झमाझम जल बरसाए बाद ल
झरने बोले कल-कल, कल-कल
इनमें बहते जाए बादल
चेहरे लगे हँसने-मुसकाने 
इतनी खुशियाँ लाए बादल ....


अमन। …… 

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

shuruaat

जिंदगी तो अपने दम पर जी जाती है। …।
औरो के कंधो पर तो जनाज़ा निकलता है.... !